एक दिन पे!
करारी रात
सांझे चूल्हे पे सेके
रोटी सा...दिन!
बीती बारिश
के बबूले से फूटे
याद के...दिन
नभ शंख में
ताप रहा है,चाँद,
मोती सा...दिन
प्रातःकुंदन,
सूर्य श्रम से...गले,
सोने सा दिन!
मृदु घांस पे
भीगी अंगड़ाई ले,
ओस सा...दिन
कोयल कुक
पाक अज़ान गूंज
पढ़ाकू...दिन
गंगा जल
समां श्लोक विभोर
काशी का...दिन
नीरव वैद्य
करारी रात
सांझे चूल्हे पे सेके
रोटी सा...दिन!
बीती बारिश
के बबूले से फूटे
याद के...दिन
नभ शंख में
ताप रहा है,चाँद,
मोती सा...दिन
प्रातःकुंदन,
सूर्य श्रम से...गले,
सोने सा दिन!
मृदु घांस पे
भीगी अंगड़ाई ले,
ओस सा...दिन
कोयल कुक
पाक अज़ान गूंज
पढ़ाकू...दिन
गंगा जल
समां श्लोक विभोर
काशी का...दिन
नीरव वैद्य
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